West Asia Tensions Escalate: मिडिल ईस्ट संकट लंबा खिंचा तो भारत में निवेश घटने का खतरा: रिपोर्ट

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दक्षिण एशिया जैसे शुद्ध तेल आयातक देशों पर इस संकट का अधिक प्रभाव पड़ने का अनुमान है।-रिपोर्ट

Continuing West Asia crisis will negatively impact investment in India claims Report

West Asia Tensions Escalate: फिच ग्रुप की इकाई बीएमआई ने मंगलवार को कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत में निवेश को प्रभावित कर सकता है और यूरोपीय संघ तथा अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों से मिलने वाले सकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है।

बीएमआई ने अपनी ‘इंडिया आउटलुक’ रिपोर्ट में कहा कि यदि ईरान संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो इसका भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर लगभग 0.3 से 0.6 प्रतिशत अंक तक नकारात्मक असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि विशेष रूप से दक्षिण एशिया जैसे शुद्ध तेल आयातक देशों पर इस संकट का अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है। हालांकि, बीएमआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7 प्रतिशत पर बनाए रखा है, जो चालू वित्त वर्ष के अनुमानित 7.9 प्रतिशत से थोड़ा कम है।     

रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से अनिश्चितता में तेज बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से निवेश धारणा प्रभावित हो सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया है, “मार्च से अनिश्चितता में तेजी से वृद्धि होने की संभावना है। हमें लगता है कि इससे भारत में निवेश हतोत्साहित होगा, जिससे यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों का सकारात्मक प्रभाव आंशिक रूप से कम हो सकता है।”

हाल ही में अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमला किया, जिसके जवाब में ईरान ने इज़राइल और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमला किया। इसके बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को चेतावनी दी। यह संकरा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। तेल कीमतों में वृद्धि से आयात बिल बढ़ेगा और ईंधन महंगाई पर दबाव पड़ेगा। भारत और अमेरिका ने पिछले महीने एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पर सहमति जताई थी, जिसके तहत शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। हालांकि, इसे लागू करने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इस बीच, अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने फरवरी में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए व्यापक जवाबी शुल्क को अवैध करार दिया। न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति ने 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपात आर्थिक शक्तियां अधिनियम (IEEPA) के तहत मिले अधिकारों से अधिक कदम उठाए थे।

इस फैसले के बाद अमेरिका ने 24 फरवरी से सभी देशों पर 10 प्रतिशत शुल्क लागू किया, जो 150 दिन के लिए रहेगा। बाद में इसे 15 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा की गई, लेकिन इस पर अभी तक कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है।

उधर, भारत और यूरोपीय संघ के बीच जनवरी में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर सहमति बनी। यह समझौता कानूनी अनुमोदन मिलने के बाद एक वर्ष के भीतर लागू किया जाएगा।

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