‘Telomeres’ का कैंसर और उम्र संबंधी समस्याओं पर होता है प्रभाव: नोबेल पुरस्कार विजेता जोस्तक का दावा
टेलोमियर क्रोमोसोम के सिरों पर मौजूद सुरक्षात्मक संरचनाएं होती हैं, जो कोशिकाओं को विभाजन के दौरान क्षति से बचाती हैं।
Health News: तनाव, उम्र से जुड़े कारक और कैंसर इनकी पूरी तरह रोकथाम के लिए अभी तक कोई जादुई तरीका नहीं मिला है। लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता जैक जोस्तक के अनुसार, इन तीनों का संबंध ‘टेलोमियर’ से जोड़ा जा सकता है, जो क्रोमोसोम के अंत में मौजूद जीन संरचना है।
विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोस्तक के अनुसार, टेलोमियर के बारे में अभी कई चीजें अनजानी हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध हैं। उनके मुताबिक, लंबे समय तक तनाव में रहने से टेलोमियर सिकुड़ सकते हैं, जिससे कोशिकाओं का क्षरण हो सकता है और व्यक्ति को उम्र से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
टेलोमियर क्रोमोसोम के सिरों पर मौजूद सुरक्षात्मक संरचनाएं होती हैं, जो कोशिकाओं को विभाजन के दौरान क्षति से बचाती हैं।
जोस्तक ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, “बुढ़ापा या कैंसर जैसी समस्याओं का कोई जादुई इलाज नहीं मिला है, लेकिन अब हम मानते हैं कि टेलोमियर का नियंत्रण इन दोनों प्रक्रियाओं में अहम भूमिका निभाता है।” उन्होंने बताया कि टेलोमियर के बारे में वर्तमान ज्ञान इसी खोज का परिणाम है कि टेलोमियर क्रोमोसोमो की सुरक्षा करते हैं।
जोस्तक के साथ यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया की एलिज़ाबेथ ब्लैकबर्न और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की कैरल ग्रीडर को इस महत्वपूर्ण खोज के लिए 2009 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
जोस्तक ने कहा, “टेलोमियर क्रोमोसोम के सिरों पर पाए जाने वाले विशेष जेनेटिक अनुक्रम होते हैं, जो बहुत लंबे डीएनए अणु हैं। टेलोमियर प्रोटीन के पूरे समूह से ढके होते हैं और क्रोमोसोम की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह पाया गया है कि ये कैंसर और उम्र बढ़ने जैसी प्रक्रियाओं में अहम योगदान रखते हैं।”
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर और हरियाणा के सोनीपत में अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज में सलाहकार जोस्तक (73) ने हाल ही में अपने भारत दौरे के दौरान बातचीत में कहा, “टेलोमियर कैसे विनियमित होते हैं, इसे कहना काफी मुश्किल है और इसे पूरी तरह से समझा नहीं गया है। लेकिन अत्यधिक तनाव जैसी परिस्थितियों का टेलोमियर पर असर पड़ता है, जिससे वे समय के साथ सिकुड़ते चले जाते हैं।”
उन्होंने कहा, “इस वजह से, स्टेम कोशिकाएं विभाजित नहीं हो पातीं और ऊतकों की मरम्मत भी ठीक से नहीं हो पाती। इसलिए, टेलोमियर का सिकुड़ना उम्र बढ़ने से जुड़ी कुछ समस्याओं का एक संभावित कारण हो सकता है।”
जोस्तक पिछले लगभग 25 वर्षों से जीवन की शुरुआत पर अध्ययन कर रहे हैं। उनका अनुसंधान विशेष रूप से प्रांरभिक धरती पर बनने वाली पहली कोशिकाओं, जिन्हें 'प्रोटोसेल' कहा जाता है, की प्रकृति और विशेषताओं को समझने पर केंद्रित रहा है।
उन्होंने कहा, “आबादी के स्तर पर पूरे मानव जीनोम का अनुक्रमण हमें अनुवांशिक कारणों, रोग प्रतिरोधक क्षमता और विभिन्न बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। इसके अलावा, यह हमें समय के साथ आबादी के बदलाव और प्रवासन के बारे में भी गहन समझ देता है।”
उन्होंने बताया कि ‘जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट’ नामक यह परियोजना यह समझने में मदद कर सकती है कि समय के साथ भारतीय आबादी कैसे विकसित हुई या उभरी।
जोस्तक ने कहा कि इसका सीधे तौर पर भारतीयों के स्वास्थ्य प्रोफाइल पर असर पड़ेगा, क्योंकि ये जातियाँ दुनिया में उन समूहों में शामिल हैं जिन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य अनुवांशिक और गैर-संक्रामक बीमारियों के प्रति संवेदनशील माना जाता है।
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