एक हार्मोन की तरह काम करता है विटामिन-डी
सिडनीः ऐसा मान लेना आसान है कि भरपूर धूप वाले देश में रहने पर शरीर को पर्याप्त विटामिन-डी मिल ही जाता होगा, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
ऑस्ट्रेलिया में लगभग हर 4 में से एक वयस्क विटामिन-डी की कमी का सामना कर रहा है। यही वजह है कि ‘विटामिन-डी सप्लीमेंट’ अब सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली पूरक दवाओं में शामिल हो चुके हैं। तो विटामिन-डी क्या है? और क्या इसे ‘सप्लीमेंट’ के रूप में लेना जरूरी है?
विटामिन-डी एक वसा में घुलने वाला विटामिन है, जो शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अधिकांश विटामिन से अलग, यह शरीर में एक हार्मोन की तरह काम करता है और शरीर की लगभग हर कोशिका में इसके लिए ‘रिसेप्टर’ मौजूद होते हैं।
विटामिन-डी कई रूपों में पाया जाता है, लेकिन कोलेकैल्सीफेरॉल के नाम से प्रचलित विटामिन-डी3 सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर में पहुंचने के बाद यह पहले लिवर और फिर गुर्दे में बदलाव से गुजरता है और अंततः ‘कैल्सिट्रिऑल’ नामक सक्रिय रूप में बदल जाता है।
शरीर खुद भी विटामिन-डी बना सकता है। इसके लिए त्वचा पर पराबैंगनी किरणों (यूवीबी) का पड़ना जरूरी होता है, जो शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल से जुड़े एक तत्व को विटामिन-डी में बदल देती हैं। कुछ खाद्य पदार्थों जैसे अंडे, ऑयली मछलियां और मशरूम से भी विटामिन-डी मिलता है, लेकिन केवल भोजन से शरीर की जरूरत पूरी होना मुश्किल माना जाता है।
विटामिन-डी का सबसे अहम काम शरीर में कैल्शियम का उपयोग करने में मदद करना है। यह आंतों से कैल्शियम के अवशोषण को बढ़ाता है, जिससे खून में कैल्शियम का स्तर पर्याप्त बना रहता है और हड्डियां मजबूत होती हैं।
यदि शरीर में विटामिन-डी की कमी हो जाए, तो कैल्शियम ठीक से अवशोषित नहीं हो पाता और इससे हड्डियों से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। बच्चों में इसकी गंभीर कमी से ‘रिकेट्स’ नामक बीमारी हो सकती है, जिसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। इससे बच्चों की वृद्धि प्रभावित होती है, हड्डियों में दर्द होता है और पैरों का मुड़ जाना जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
वहीं वयस्कों में इसकी कमी ‘ऑस्टियोमलेशिया’ नामक स्थिति पैदा कर सकती है। इसमें हड्डियों में दर्द, थकान और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन-डी की कमी मांसपेशियों की कमजोरी, ऐंठन और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली से भी जुड़ी है। इससे श्वसन संक्रमण होने की आशंका बढ़ जाती है।
विटामिन-डी की कमी का सबसे बड़ा कारण पर्याप्त धूप न मिलना है। यदि कोई व्यक्ति ज्यादातर समय घर के अंदर बिताता है, या रात की पाली में काम करता है और दिन में सोता है, तो वह धूप के संपर्क में कम ही आता है और शरीर में विटामिन-डी का निर्माण भी कम होता है।
हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में सामान्य तौर पर धूप भरपूर मिलती है, लेकिन कुछ इलाकों में लंबे समय तक सूरज की रोशनी बहुत कम रहती है। इससे भी विटामिन-डी की कमी हो सकती है। तस्मानिया जैसे उत्तरी और दक्षिणी अक्षांश वाले क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान दिन में केवल कुछ घंटे ही धूप मिल पाती है।
ऐसे इलाकों में रहने वाले लोगों में न सिर्फ विटामिन-डी की कमी हो सकती है, बल्कि वे ‘सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर’ नामक अवसाद से भी प्रभावित हो सकते हैं, जिसका संबंध कम विटामिन-डी स्तर से माना जाता है।
ऑस्ट्रेलिया में विटामिन-डी के लिए कई प्रकार के सप्लीमेंट उपलब्ध हैं। इनमें विटामिन-डी3 की कम खुराक (20 माइक्रोग्राम) और ज्यादा खुराक (175 माइक्रोग्राम) वाली दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा विटामिन-डी के सक्रिय रूप ‘कैल्सिट्रिऑल’ की 0.25 माइक्रोग्राम खुराक भी उपलब्ध है।
विटामिन-डी3 वाली दोनों दवाएं विटामिन-डी की कमी के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं, जबकि कैल्सिट्रिऑल का उपयोग लंबे समय से गुर्दे संबंधी बीमारी से जूझ रहे मरीजों में कैल्शियम की कमी दूर करने के लिए किया जाता है। कम खुराक वाली विटामिन-डी3 दवा रोज ली जाती है, जबकि ज्यादा खुराक वाली दवा सप्ताह में एक बार ली जाती है।
क्या विटामिन-डी लेना नुकसानदायक हो सकता है?
सामान्य तौर पर विटामिन-डी3 सुरक्षित माना जाता है। रोजाना 100 माइक्रोग्राम तक की मात्रा को सुरक्षित सीमा माना गया है। यदि लंबे समय तक 100 माइक्रोग्राम से ज्यादा मात्रा ली जाए, तो शरीर में अत्यधिक कैल्शियम अवशोषित होने लगता है। इससे मतली, उल्टी, मांसपेशियों की कमजोरी, भूख कम लगना, शरीर में पानी की कमी, ज्यादा प्यास लगना और गुर्दे की पथरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
अधिकांश लोगों को शरीर में पर्याप्त विटामिन-डी बनाने के लिए सप्ताह में कई बार केवल 5 से 30 मिनट तक सीधी धूप में रहना पर्याप्त होता है। इसलिए यदि आपको पर्याप्त धूप मिल रही है और त्वचा से जुड़ी कोई समस्या नहीं है, तो आमतौर पर सप्लीमेंट लेने की जरूरत नहीं पड़ती।