तू प्रभ दाता दानि मति पूरा हम थारे भेखारी जीउ ॥
हुकमनामा साहिब
सोरठि महला १ ॥
तू प्रभ दाता दानि मति पूरा हम थारे भेखारी जीउ ॥ मै किआ मागउ किछु थिरु न रहाई हरि दीजै नामु पिआरी जीउ ॥१॥
घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥ जलि थलि महीअलि गुपतो वरतै गुर सबदी देखि निहारी जीउ ॥ रहाउ ॥
मरत पइआल अकासु दिखाइओ गुरि सतिगुरि किरपा धारी जीउ ॥ सो ब्रहमु अजोनी है भी होनी घट भीतरि देखु मुरारी जीउ ॥२॥
जनम मरन कउ इहु जगु बपुड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥ सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥३॥
सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥ नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥४॥८॥
हुकमनामा साहिब - हिंदी अर्थ
सोरठि महला १ ॥ हे प्रभु! तू दाता एवं दानशील है और बुद्धि से परिपूर्ण है, लेकिन हम तो तेरे भिखारी ही हैं। मैं तुझ से क्या माँगूं? क्योंकि कुछ भी स्थिर रहने वाला नहीं है अर्थात् प्रत्येक पदार्थ नश्वर है। इसलिए मुझे तो केवल अपना प्यारा हरि-नाम ही दीजिए।॥१ ॥
प्रभु तो प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। वह समुद्र, धरती एवं गगन में गुप्त रूप से व्यापक है और गुरु के शब्द द्वारा उसके दर्शन करके कृतार्थ हुआ जा सकता है।॥ रहाउ ॥
गुरु-सतगुरु ने कृपा करके मृत्युलोक, पाताल लोक एवं आकाश में उसके दर्शन करवा दिए हैं। वह अयोनि ब्रह्म वर्तमान में भी है और भविष्य में भी विद्यमान रहेगा। इसलिए अपने हृदय में ही मुरारि प्रभु के दर्शन करो ॥ २॥
बेचारी यह दुनियां तो जन्म मरण के चक्र में ही पड़ी हुई है, चूंकि इसने द्वैतभाव में फंसकर प्रभु-भक्ति को ही भुला दिया है। जब सतगुरु मिल जाता है तो ही ज्ञान प्राप्त होता है, किन्तु शाक्त मनुष्य ने भक्ति के बिना अपनी जीवन की बाजी हार दी है।॥३॥
सतिगुरु ने मेरे बन्धन तोड़कर मुझे मुक्त कर दिया है और अब मैं गर्भ-योनि में नहीं आऊँगा। हे नानक ! अब मेरे हदय में ज्ञान-रत्न का प्रकाश हो गया है और निराकार प्रभु ने मेरे मन में निवास कर लिया है।॥४ ॥८ ॥