अदालत ने हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का प्रस्ताव रखा है।
Aravalli Hills SC Hearing: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया, जिसमें अरावली की पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव संबंधी रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था और पहाड़ियों तथा पर्वतमालाओं के लिए समान परिभाषा लागू करने का निर्णय लिया गया था। अदालत ने कहा कि किसी भी कार्यान्वयन से पहले निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय पर विचार करना आवश्यक है, ताकि स्पष्ट और निर्णायक मार्गदर्शन मिल सके। (The Supreme Court has stayed its own order in the Aravalli case news in hindi)
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मुद्दे की व्यापक और समग्र जांच के लिए क्षेत्र विशेषज्ञों (डोमेन एक्सपर्ट्स) से युक्त एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है।
अरावली पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा को लेकर उठी चिंताओं के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के जरिए सोमवार को सुनवाई की और इस दौरान अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव संबंधी अपने पूर्व निर्देशों को फिलहाल स्थगित कर दिया। शीर्ष अदालत ने चिंता जताई कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और न्यायालय के आदेशों की गलत व्याख्या की जा रही है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने कहा कि रिपोर्ट या अदालत के निर्देशों को लागू करने से पहले और अधिक स्पष्टता आवश्यक है। बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले में नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई की तारीख 21 जनवरी तय की। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति की सिफारिशें तथा 20 नवंबर 2025 के न्यायालय के निर्णय और निर्देश फिलहाल लागू नहीं किए जाएंगे।
अदालत ने कहा कि समिति की सिफारिशों और न्यायालय के निर्देशों को फिलहाल स्थगित रखना आवश्यक है। यह स्थगन समिति के गठन तक प्रभावी रहेगा। यह स्वतः संज्ञान मामला इसी आशंका के बाद दर्ज किया गया कि अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हालिया बदलाव से अनियंत्रित खनन और पर्यावरणीय क्षति के रास्ते खुल सकते हैं।
अदालत ने कहा कि किसी भी कार्यान्वयन से पहले निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय पर विचार किया जाना जरूरी है, ताकि स्पष्ट और निर्णायक मार्गदर्शन मिल सके। न्यायालय ने यह भी देखा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा से कहीं कोई संरचनात्मक विरोधाभास तो नहीं पैदा हुआ है और क्या इसके उलट गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ गया है, जिससे अनियंत्रित खनन को बढ़ावा मिल सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्यायालय एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव रखता है, जो रिपोर्ट का समग्र मूल्यांकन करेगी और सभी उठाए गए सवालों की जांच करेगी। इस प्रक्रिया में उन क्षेत्रों की विस्तृत पहचान भी शामिल होगी जिन्हें अरावली क्षेत्र से बाहर किया जा सकता है, साथ ही यह आकलन भी किया जाएगा कि ऐसे बहिष्करण से अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिक अखंडता को कोई नुकसान तो नहीं होगा।
अदालत ने मामले में नोटिस जारी किया और भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि तथा वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. परमेश्वर से न्यायालय की सहायता करने का अनुरोध किया, विशेष रूप से प्रस्तावित समिति की संरचना पर राय देने के लिए। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि संबंधित राज्यों को नोटिस जारी कर दिया गया है और उन्हें निर्देश दिया गया है कि आगे किसी भी खनन गतिविधि को अंजाम न दिया जाए।
जानें पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की संशोधित परिभाषा को लेकर पर्यावरण समूहों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों द्वारा उठाई गई चिंताओं और सार्वजनिक विरोध के बाद स्वतः संज्ञान लिया। अरावली क्षेत्र अपनी पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) महत्व के लिए जाना जाता है और विशेष रूप से मरुस्थलीकरण को रोकने और भूजल स्तर बनाए रखने में इसकी अहम भूमिका है।
आशंका जताई गई कि इस परिभाषा को कमजोर करने से उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण गतिविधियों को वैधता मिल सकती है, जिन्हें पहले संरक्षित माना जाता था। यह विवाद दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की अलग-अलग परिभाषाओं के कारण उत्पन्न हुआ, जिससे नियामकीय खामियां और अवैध खनन के मामले सामने आए। इन असंगतियों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी।
क्या थी समिति की सिफारिश ?
समिति ने सिफारिश की थी कि 'अरावली पहाड़ी' को अरावली जिलों में स्थित किसी भी भू-आकृतिक संरचना के रूप में परिभाषित किया जाए, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-आकृति से 100 मीटर या उससे अधिक हो। इसके अलावा, “अरावली पर्वतमाला” दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह होगी, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों।
अरावली जिलों में स्थित किसी भी भू-आकृतिक संरचना, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-आकृति से 100 मीटर या अधिक हो, को अरावली पहाड़ी माना जाएगा। उस पहाड़ी, उसकी सहायक ढलानों और संबंधित भू-आकृतियों सहित, उनकी ढाल चाहे जैसी भी हो, अरावली पहाड़ियों का हिस्सा मानी जाएगी।
समिति ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा भी दी और कहा कि दो या अधिक अरावली पहाड़ियां, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर हों, वे मिलकर अरावली पर्वतमाला का निर्माण करेंगी।