बनर्जी ने चेतावनी दी कि नीतिगत अनिश्चितता और आंतरिक ध्रुवीकरण देश की दीर्घकालिक निवेश क्षमता को कमजोर कर रहे हैं।
Abhijit Banerjee Warning: नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने चेतावनी दी है कि भारत में बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण पारदर्शिता को कमजोर कर रहा है और देश को वैश्विक निवेशकों के लिए एक “रहस्य” बना रहा है, भले ही आर्थिक वृद्धि के आंकड़े मजबूत बने हुए हों।
पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में बनर्जी ने कहा कि आर्थिक दृष्टि से इस समय देश के सामने सबसे अहम मुद्दे मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता हैं। उन्होंने तर्क दिया कि निवेशकों की चिंता राजनीतिक बयानबाजी से अधिक आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर होती है।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि भारत एक ऐसे राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत दौर से गुजर रहा है, जहां कई पुराने मतभेद मौजूद हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमें यह तय करना होगा कि हम खुद को कितना खुला और भरोसेमंद दिखाना चाहते हैं। असली मुद्दा मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़ा है।”
उन्होंने आगे स्पष्ट किया, “सबसे अहम सवाल मीडिया की स्वतंत्रता और पारदर्शिता का है। क्या हमें वास्तव में पता है कि आंकड़े क्या संकेत दे रहे हैं? निवेशकों के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण होता है।” भारत विदेशी निवेश आकर्षित करता रहा है, लेकिन बनर्जी ने कहा कि ये निवेश प्रवाह अस्थिर हैं और अनिश्चितताओं के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं।
उन्होंने कहा, “हमने विदेशी निवेश के मोर्चे पर ठीक-ठाक प्रदर्शन किया है, लेकिन यह अस्थिर बना हुआ है। रुपये में गिरावट का एक कारण यह भी है कि पर्याप्त निवेश प्रवाह नहीं आ रहा।” उन्होंने मुद्रा की कमजोरी को लगातार पूंजी प्रवाह की कमी से जोड़ा।
बनर्जी ने चेतावनी दी कि नीतिगत अनिश्चितता और आंतरिक ध्रुवीकरण देश की दीर्घकालिक निवेश क्षमता को कमजोर कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “लोगों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि नीति के नियम क्या हैं और क्या किसी खास कंपनी के प्रति रुख बदल सकता है।” साथ ही उन्होंने जोड़ा, “जब तक हमारे पास एक पूर्वानुमेय और पारदर्शी नीतिगत ढांचा और स्वतंत्र मीडिया नहीं होगा, तब तक भारत दुनिया के लिए एक रहस्य बना रहेगा।”
उन्होंने कहा कि अगर भारत अपनी पूंजी बाजार को गहरा करना और लंबी अवधि का वैश्विक निवेश आकर्षित करना चाहता है, तो पारदर्शिता संगठित और लगातार होनी चाहिए, न कि कभी-कभार। अर्थशास्त्री ने कहा, ”अगर हम ऐसा देश बनाना चाहते हैं, जहां लोग हमेशा निवेश करना चाहें, तो हर स्तर पर पारदर्शिता जरूरी है।”
जब उनसे पूछा गया कि क्या पहचान राजनीति ने विकास प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ दिया है, बनर्जी ने कहा कि ऐसी राजनीति दुनिया भर में मौजूद है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में, लेकिन सवाल यह है कि क्या देश का नेतृत्व विकास के व्यावहारिक रोडमैप पर पर्याप्त सोच रहा है।
उन्होंने कहा, “सरकार विकास के प्रति गंभीर है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं सोच पाई कि वास्तव में इसके लिए क्या करना होगा।”
उन्होंने आगे कहा, ”रोडमैप क्या है, सभी को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा कैसे मिलेगी, सीमित अच्छी नौकरियों की समस्या से कैसे बाहर निकला जाए, और अगर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अधिक नौकरियां ले लेती है तो क्या होगा?” बनर्जी ने चेतावनी दी कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ऊपरी वृद्धि लंबे समय तक गहरी सामाजिक परेशानियों को छुपा नहीं सकती।
उन्होंने कहा, ”GDP बढ़ सकता है, लेकिन अगर अधिकांश लोगों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी, तो विकास धीमा होगा और समस्याएं बढ़ेंगी। संसाधनों के वितरण से जुड़े सवाल अभी भी समाधान के इंतजार में हैं।”
बाजार से आगे बढ़ते हुए, बनर्जी ने राजनीतिक स्थिरता के लॉन्ग टर्म जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जब संस्थानों पर विश्वास टूटता है, तो आर्थिक सुधार लगभग असंभव हो जाता है।
उन्होंने कहा, ”अगर लोग मतदान प्रक्रिया से बाहर महसूस करते हैं, तो इससे अन्य समस्याएं पैदा होती हैं।” उन्होंने जोड़ा कि विश्वास की गिरावट सहमति आधारित सुधार को अत्यंत कठिन बना देती है।
कृषकों को बिजली सब्सिडी के संदर्भ में बनर्जी ने कहा कि प्रत्यक्ष मुआवजा आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठ और पर्यावरणीय रूप से आवश्यक होगा, खासकर जब भूमिगत जल स्तर घट रहा हो, लेकिन यह सुधार राजनीतिक रूप से असंभव है क्योंकि भरोसे की कमी है।
बनर्जी ने ‘भत्ता राजनीति’ शब्द को अस्वीकार किया और कहा कि बड़े पैमाने पर पब्लिक ट्रांसफर, विशेष रूप से मध्य और उच्च वर्ग के लिए, शायद ही कभी स्वीकार किया जाता है।
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