वैज्ञानिकों को मिली बड़ी कामयाबी! अंतरिक्ष से आ रहे रहस्यमय धीमे रेडियो संकेतों की गुत्थी जल्द सुलझ सकती है
वैज्ञानिकों को मिली बड़ी कामयाबी! अंतरिक्ष से आ रहे रहस्यमय धीमे रेडियो संकेतों की गुत्थी जल्द सुलझ सकती है
Published : Feb 2, 2026, 6:38 pm IST
Updated : Feb 2, 2026, 6:38 pm IST
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The mystery of the mysterious slow radio signals coming from space may soon be solved.
The mystery of the mysterious slow radio signals coming from space may soon be solved.

‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में इन संकेतों की प्रकृति को लेकर अहम जानकारी सामने आई है।    

Latest Space Mystery: अंतरिक्ष से हर कुछ मिनटों या घंटों में दोहराए जाने वाले रहस्यमय रेडियो संकेत ‘‘लॉन्ग-पीरियड ट्रांज़िएंट्स’’ की खोज 2022 में हुई थी लेकिन इनके बारे में तब अधिक जानकारी नहीं मिल पाई और खगोलविद इनका रहस्य सुलझाने के लिए लगातार प्रयास करते रहे।     

‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में इन संकेतों की प्रकृति को लेकर अहम जानकारी सामने आई है।    

रेडियो खगोलविद ‘पल्सर’ से भली-भांति परिचित हैं, जो तेजी से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे होते हैं। पृथ्वी से देखने पर ये इसलिए स्पंदित दिखाई देते हैं क्योंकि इनके ध्रुवों से निकलने वाली शक्तिशाली रेडियो किरणें लाइटहाउस की तरह अंतरिक्ष में घूमती हैं। अब तक ज्ञात सबसे धीमे पल्सर भी कुछ सेकंड में एक चक्कर पूरा कर लेते हैं।  

हाल के वर्षों में ऐसे रेडियो संकेतों के स्रोत खोजे गए हैं, जिनकी अवधि 18 मिनट से लेकर छह घंटे से अधिक तक है। मौजूदा भौतिकी के अनुसार, न्यूट्रॉन तारे इतनी धीमी गति से घूमते हुए रेडियो तरंगें उत्पन्न नहीं कर सकते, जिससे वैज्ञानिकों के सामने नई पहेली खड़ी हो गई।    

अध्ययन के अनुसार, अब तक का सबसे लंबे समय तक सक्रिय लॉन्ग-पीरियड ट्रांज़िएंट जीपीएम जे1839-10 है जो वास्तव में एक ‘व्हाइट ड्वार्फ’ तारा हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तारा अपने एक सहचर तारे की मदद से शक्तिशाली रेडियो किरणें उत्पन्न कर रहा है, और संभव है कि अन्य ऐसे स्रोत भी इसी तरह के हों। 

‘व्हाइट ड्वार्फ’ मृत तारों के अवशेष होते हैं, जो आकार में पृथ्वी जितने लेकिन द्रव्यमान में सूर्य के बराबर होते हैं। अकेले व्हाइट ड्वार्फ से अब तक रेडियो स्पंदन नहीं देखे गए हैं, लेकिन जब वे किसी एम-टाइप ड्वार्फ तारे के साथ द्वितारा प्रणाली में होते हैं, तो ऐसी गतिविधि संभव हो जाती है। वर्ष 2016 में पहले व्हाइट ड्वार्फ पल्सर की पुष्टि हो चुकी है।   

अब तक खोजे गए दस से अधिक लॉन्ग-पीरियड ट्रांज़िएंट्स में से 2025 में पहली बार दो को निश्चित रूप से व्हाइट ड्वार्फ–एम-ड्वार्फ द्वितारा प्रणाली के रूप में पहचाना गया, जिसने वैज्ञानिकों को नए सवालों पर विचार करने के लिए मजबूर किया।    

वर्ष 2023 में खोजे गये जीपीएम जे1839-10 की परिक्रमा अवधि 21 मिनट है और यह अन्य स्रोतों की तुलना में असाधारण रूप से लंबे समय से सक्रिय पाया गया। अभिलेखीय आंकड़ों में इसके संकेत 1988 तक दर्ज मिले। यह स्रोत पृथ्वी से लगभग 15,000 प्रकाश-वर्ष दूर है और केवल रेडियो तरंगों में ही दिखाई देता है।   

तीन महाद्वीपों में स्थित रेडियो दूरबीनों—ऑस्ट्रेलिया की एएसकेएपी, दक्षिण अफ्रीका की मीरकैट और अमेरिका की वेरी लार्ज ऐरे—से किए गए अवलोकनों में पाया गया कि इसके संकेत पूरी तरह नियमित हैं। संकेतों का यह पैटर्न नौ घंटे में दोहराया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह एक द्वितारा प्रणाली है।    

शोधकर्ताओं ने रेडियो आंकड़ों के आधार पर इस प्रणाली की ज्यामिति, तारों के बीच की दूरी और उनके द्रव्यमान का भी अनुमान लगाया है। अध्ययन के मुताबिक, जीपीएम जे1839-10 लॉन्ग-पीरियड ट्रांज़िएंट्स और व्हाइट ड्वार्फ पल्सर्स के बीच की ‘मिसिंग लिंक’ हो सकता है।   

वैज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि रेडियो उत्सर्जन की भौतिकी को पूरी तरह समझने के लिए और शोध की जरूरत है, लेकिन यह अध्ययन इन रहस्यमय संकेतों की प्रकृति को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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