प्राइवेसी के मामले में यह ऐप मील का पत्थर है
बोकारो । क्या भारत अब डिजिटल गुलामी की बेड़ियां काटने को तैयार है? क्या मुट्ठी भर विदेशी कंपनियां ही तय करेंगी कि हमारा डेटा कहाँ जाएगा? इन सवालों का करारा जवाब झारखंड की राजधानी रांची से निकला है। रांची प्रेस क्लब में आयोजित एक नया इतिहास रचा गया जब औरंगाबाद की मिट्टी से ताल्लुक रखने वाले और फिनलैंड में 20 सालों तक हाई-टेक सेक्टर में अपनी तकनीक का लोहा मनवाने वाले सुनील कुमार सिंह ने अपना स्वदेशी सुपर ऐप जैक्टर दुनिया के सामने पेश किया। इस लॉन्चिंग ने साफ़ कर दिया है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो रांची की गलियों से उठकर भी अमेरिका की अरबों डॉलर वाली कंपनियों के घमंड को चूर किया जा सकता है।
सुनील कुमार सिंह ने इस सफर में स्वाभिमान की एक ऐसी लकीर खींची है जिसे पार करना विदेशी कंपनियों के बस की बात नहीं। अक्सर नए स्टार्टअप्स सरकारी अनुदान की बैसाखियों या विदेशी निवेशकों की विदेशी फंडिंग के पीछे भागते हैं। लेकिन सुनील ने साफ़ कह दिया कि हमें इस डिजिटल साम्राज्य को खड़ा करने के लिए न तो किसी सरकारी सहायता की दरकार थी और न ही हमने किसी विदेशी वेंचर कैपिटल के आगे हाथ फैलाया। यह पूरी तरह से एक स्व-वित्तपोषित भारतीय मिशन है।
सुनील का विजन एकदम स्पष्ट है, अगर ऐप भारतीय है, तो उसका मालिकाना हक और डेटा का रिमोट भी पूरी तरह भारतीय हाथों में ही होना चाहिए। यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को किताबों से निकाल कर हकीकत की जमीन पर उतार रहा है।तकनीकी मोर्चे पर जैक्टर ने ठीक वही इसरो वाला फॉर्मूला अपनाया है जिसने मंगलयान को दुनिया में सबसे सस्ता और सफल बनाया।
जहाँ विदेशी कंपनियां सर्वर के रखरखाव पर पानी की तरह पैसा बहाती हैं, वहीं जैक्टर का आर्किटेक्चर उनसे 6 से 8 गुना कम खर्च पर संचालित होता है। तकनीकी दुनिया में इसे एक चमत्कार माना जा रहा है, क्योंकि कम खर्च का मतलब है कि यह ऐप लंबे समय तक बिना किसी बाहरी दबाव के स्वतंत्र रूप से चल सकता है। यही वह तकनीक है जो इसे दुनिया का सबसे आधुनिक और किफायती सुपर ऐप बनाती है।आज के दौर में सबसे बड़ी चिंता डेटा चोरी और डीपफेक वीडियो की है। प्राइवेसी के मामले में यह ऐप मील का पत्थर है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए इसमें दुनिया का पहला नो-यूआरएल ब्रह्मास्त्र विकसित किया गया है। इसका तकनीकी मतलब यह है कि इंटरनेट पर आपके कंटेंट (फोटो या वीडियो) का कोई सार्वजनिक लिंक ही नहीं होगा। जब लिंक ही नहीं होगा, तो कोई उसे अवैध रूप से डाउनलोड नहीं कर पाएगा और एआई के जरिए उसका गलत इस्तेमाल करना नामुमकिन हो जाएगा। यह फीचर उन विदेशी ऐप्स के मुंह पर तमाचा है जो सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे तो करते हैं, लेकिन डेटा लीक रोकने में नाकाम रहते हैं।यह सिर्फ रांची या झारखंड की बात नहीं है, जैक्टर ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघना शुरू कर दिया है।
सुनील सिंह ने बताया कि इस ऐप की टेस्टिंग न केवल भारत के विभिन्न राज्यों में सफल रही है, बल्कि श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी इसे बेहतरीन रिस्पांस मिला है। इन देशों में भी डेटा सुरक्षा को लेकर वैसी ही चिंताएं हैं जैसी भारत में हैं। ज़क्टर का लक्ष्य आने वाले समय में दक्षिण एशिया का सबसे भरोसेमंद प्लेटफॉर्म बनना है। रांची की धरती पर तैयार यह तकनीक अब ग्लोबल मार्केट में अपना परचम लहराने को तैयार है।इसकी सुरक्षा इतनी अभेद्य है कि इसे जीरो नॉलेज सिस्टम पर बनाया गया है। इसका मतलब है कि यूजर का डेटा इतना गुप्त है कि खुद कंपनी का मालिक, एडमिन या कोई भी इंजीनियर आपकी निजी बातचीत और पर्सनल डेटा को नहीं पढ़ सकता। आज के दौर में जहाँ विदेशी कंपनियां हमारे डेटा को बेचकर मुनाफा कमाती हैं, वहां ज़क्टर का यह मॉडल 'डेटा संप्रभुता' की एक नई परिभाषा लिख रहा है। आपका सारा डेटा भारत की सीमा के भीतर सुरक्षित भारतीय सर्वरों पर ही रहेगा, यानी सात समंदर पार हमारा डेटा चोरी होने का कोई डर नहीं।सुनील सिंह के पास फिनलैंड के कड़े सुरक्षा मानकों वाले टेक सेक्टर में काम करने का दो दशकों का अनुभव है। उन्होंने विदेशी सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपनी माटी की ओर रुख किया और रांची के प्रतिभावान युवा इंजीनियरों की एक टीम तैयार की। इस टीम ने दिन-रात एक कर साबित कर दिया कि झारखंड का टैलेंट किसी भी ग्लोबल कंपनी को धूल चटा सकता है। इसके अलावा, ज़क्टर ने क्रिएटर्स को उनकी मेहनत की कमाई का सीधा 70 प्रतिशत हिस्सा देने का ऐलान किया है, जो डिजिटल इकोनॉमी में अब तक की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है।
रांची में पंजीकृत यह शत-प्रतिशत स्वदेशी ऐप पूरी तरह भारतीय युवाओं की मेहनत से तैयार हुआ है। इसकी सुरक्षा इतनी अभेद्य है कि जीरो नॉलेज सिस्टम के चलते खुद कंपनी का मालिक भी आपका डेटा नहीं देख सकता। इसे बिना किसी विदेशी फंडिंग या वेंचर कैपिटल के पूरी तरह आत्मनिर्भर संकल्प से बनाया गया है। डेटा संप्रभुता का ध्यान रखते हुए सारा डेटा भारत के सर्वरों पर ही रहेगा। महिलाओं के लिए विशेष 'नो-यूआरएल' फीचर इसे दुनिया का सबसे सुरक्षित ऐप बनाता है, जिससे डेटा चोरी असंभव है। यह ऐप श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में भी सफलतापूर्वक टेस्ट किया जा चुका है। साथ ही, इसरो की तर्ज पर यह अमेरिकी ऐप्स के मुकाबले 8 गुना कम खर्च पर चलता है, जो इसकी सबसे बड़ी तकनीकी जीत है।सुनील कुमार सिंह और रांची के इन युवाओं की यह जीत हर झारखंडी और हर हिंदुस्तानी का सिर गर्व से ऊँचा करने वाली है। प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत का असली योद्धा आज रांची में नजर आया है। यह ऐप अब प्ले स्टोर और एप्पल स्टोर पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध है।